Wisdom of Life

हिमालय की छांव में छठ

chath-puja-siliguri
हिंदी समाज की श्रम संस्कृति की अभिव्यक्ति है छठ पूजा
राजेन्द्र प्रसाद सिंह

राजेन्द्र प्रसाद सिंह

फिरंगी हुकूमत ने 18 वीं शताब्दी के मध्य में दार्जिलिंग की पहाड़ियों में चाय की ख्ोती शुरू की। इसके लिए सस्ते मजदूर दक्षिण बिहार से प्रलोभन देकर लाये गये। कुछ समय बाद बिहार व उत्तर प्रदेश से व्यावसायिक वर्ग के लोगों का धीरे-धीरे आना शुरू हुआ। ये लोग अपने साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत लेकर यहां आये। इसके बाद पढ़े-लिख्ो लोग भी नौकरी की तलाश में इस ओर बढ़े। दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का निर्माण कार्य 1879 में दार्जिलिंग स्टीम ट्रामवे कंपनी की निगरानी में शुरू हुआ। इसके लिए बड़ी संख्या में बिहार से रेल मजदूरों को लाया गया। ये मजदूर अपने साथ बिहार की संपन्न श्रम-संस्कृती को लेकर यहां आये। दरअसल छठ पूजा हिन्दी श्रमजीवी समाज की श्रम संस्कृति की एक सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में प्रकट हुई। इस प्रकार 19वीं शताब्दी के प्रथम चरण में ही हिमालय की मनोरम छांव में छठ पूजा की शुरुआत हो गयी थी। ज्ञातव्य है कि सगीना महतो फिल्म की पटभूमि इसी हिमालय क्ष्ोत्र में लिखी गयी। बिहार के किसी सुदूर ग्राम से यहां आये सगीना महतो बिहार की श्रम संस्कृति व जीवटता का जीवंत प्रतीक बन चुके हैं। प्रारंभ में छठ पूजा के केंद्रस्थल के रूप में हिमालय क्ष्ोत्र में फैले महानंदा संलग चाय बागान इलाके रहे। कुछ मजदूर तो अपनी सहूलियत के हिसाब से पहाड़ी झरनों के आसपास ही छठ पूजा करने लगे। सर्वप्रथम हिमालय की छांव में हिन्दी श्रमजीवी समाज की श्रम संस्कृति छठ पूजा के रूप में अभिव्यक्त हुई। कालांतर में इसने कई धर्म समाज व संस्कृतियों को अपनी ओर आकृष्ट किया। धीरे-धीरे यह त्योहार उत्तर बंगाल के संपूर्ण तराई इलाकों को पार कर सिक्किम तक पहुंच गया। आज यह पर्व अनेकता में एकता अर्यात भारत की सामासिक संस्कृति का प्रतीक बन गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार महीनों का नामकरण नक्षत्रों के आधार पर हुआ है। छठ पूजा कार्तिक माह अर्थात् कृत्तिका नक्षत्र में होती है। गणना के हिसाब से कृत्तिका नक्षत्र छह तारों के समूह को कहते हैं। वैदिक काल में भी छह तारों के समूह को कृत्तिका नक्षत्र कहा जात था। यही कारण है कि कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि को छठ पूजा की शुरुआत होती है।

छठ पूजा का सामाजिक स्वरूप :
कार्तिक मास नयी फसल का महीना है। साठी व कतिका धान आदि की फसल इस समय तक कट जाती है। इस समय तक नये फल फूल पेड़ों पर लग जाते हैं। मौसम भी अपना करवट बदलता है और इसी के साथ किसान रबी की फसल अपने खेतों में बोना शुरू कर देते हैं। चूंकि भारत किसानों का देश है और यहां की लगभग 75 प्रतिशत आबादी आज भी कृषि कार्य पर निर्भर है, इसलिए कृषि देश की अर्थनीति की धुरी मानी जाती है। इस समय किसानों मंे नयी फसल के तैयार होने की खुशी व उमंग होती है। साथ ही नयी फसल को बोने का उत्साह भी रहता है। किसानों की इस खुशी की अभिव्यक्ति छठ पूजा के रूप में देखी जा सकती है। उल्लेखनीय है कि खरना में व्रती साठी के चावल से बने खीर को प्रसाद के तौर पर ग्रहण करते हैं। इस त्योहार में मौसम में उपजे सभी तरह के फूलों, फलों का तथा अन्न का उपयोग किया जाता है।
वैदिक काल में भी छठ पूजा का प्रचलन :
वैदिक काल में भी छठ पूजा होती थी। इसके अनेक उदाहरण हैं। लेकिन उस समय इस पूजा का स्वरूप भिन्न था। काल परिवर्तन के साथ ही इसमें कई बदलाव आये। वैदिक काल में लोगों का यह विश्वास था कि देवगण भोजन नहीं करते हैं। इसलिए अगि में घी, फल, फूल व अन्न आदि का हवन किया जाता था। अगि इस सामग्रियों को ग्रहण करती और धुआं में बदल देती। वैदिक समाज की मान्यता थी कि देवगण धुएं से ही उन सामग्रियों को ग्रहण कर लेते हैं। लोगों का यह विश्वास था कि अगि-हवन के कारण ही आकाश में बादल लगते हैं और बादल से वृष्टि होती है। चूंकि सूर्य देव भी अपने ताप से नदी व समंदर के जल का अवशोषण कर उसे वाष्प में बदल देते हैं जिससे बादल बनते हैं और बादलों से वर्षा होती है, इसलिए वैदिक समाज में उनका महत्त्व सर्वाधिक रहा। प्रारंभ से सूर्य को ऊर्जा के स्रोत के रूप में मान्यता मिली है, इसलिए उन्हें देव के रूप में स्वीकार किया गया। पौराणिक आख्यान के अनुसार कृत्तिका को छह बहनों का समूह माना गया है। बाद में उन्हें देवियों का दर्जा मिला। वैदिक समाज में सूर्य को रोज ही हवन दिया जाता था जबकि कृत्तिका को वर्ष में सिर्फ एक बार ही हवन देने की परंपरा रही। प्राचीन मिस्र में भी सूर्य उपासना प्रचलित थी। पौराणिक काल में वैदिक काल के तथ्य मिथक के रूप में बदल गये। काल परिवर्तन के साथ ही इसके स्वरूप में भी बदलाव आया। प्रारंभ में छठ पूजा सिर्फ श्रम संस्कृति से जुड़े हुए लोगों का त्योहार रहा। लेकिन बाद में यह त्योहार विभिन्न वर्ग समूहों को भी अपनी ओर आकृष्ट किया। पौराणिक काल में कृत्तिका के साथ शिव-वीर्य से उत्पन्न कार्तिकेय को भी जोड़ दिया गया। बाद में कार्तिकेय का नाम भी छठ पूजा से जुड़ गया। यही कारण है कि कई औरतें पुत्र प्राप्ति के लिए भी छठ व्रत का पालन करती हैं। लोगों का यह विश्वास है कि इस व्रत के करने से सुख, समृद्धि, वांछित संतान प्रा’ि, निरोगी काया तथा अच्छी फसल मिलती है। चूंकि सूर्य को सभी नक्षत्रों का राजा माना जाता है और मिथक के मुताबिक कार्तिक महीने में सूर्य कृत्तिका नक्षत्र के क्ष्ोत्र में रहता है, इसलिए छठ पूजा में कृत्तिका के साथ सूर्य को भी अघ्र्य देने परंपरा चल पड़ी। षष्ठी व स’मी के रोज हिमालय के गर्भ से निकली महानंदा के सैकड़ों घाटों पर व्रतियों की भीड़ देखने पर ऐसा लगता है कि बिहार और उत्तर प्रदेश अपनी संपन्न विरासत की पताका हिमालय की घाटियों पर फहरा रहा है। मगर हिंदी अवाम को सिलीगुड़ी नगर निगम से एक बड़ी शिकायत है। शिकायत यह कि विभिन्न छठ घाट समितियों से सफाई और बिजली के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है। हिंदी अवाम चाहता है कि इसपर तत्काल रोक लगे।
संपादक: ‘आपका तिस्ता-हिमालय’
अपर रोड, गुरुंग नगर, पो. प्रधान नगर, सिलीगुड़ी-734003

Ankit

About Author: Ankit

Ankit Bansal started website development since 2008 and is a M. Sc.IT degree holder from KUVEMPU University. He started blogging in year 2010 and pumped up different topics like technology, career, health and travel in his blog. His websites has continuously jumped up in alexa ranking over due course of time. He now runs his own SEO and Website Development firm, RS Infosolution in Siliguri, West Bengal.